कब और कैसे शुरु हुई होली खेलने की परंपरा, जब नहीं थे कलर तब कैसे मनाते थे यह त्योहार?

Holi 2026: हिंदू धर्म में रंगों का त्योहार होली का विशेष महत्व है. इस पर्व के आने का लोग पूरे साल इंतजार करते हैं. इस दिन क्या अमीर और क्या गरीब, सभी लोग मिलजुल कर एक-दूसरे को रंग, अबीर और गुलाल लगाते हैं. इस दिन घर में अच्छे-अच्छे पकवान बनते हैं. होली की परंपरा सिर्फ मस्ती की नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और प्रकृति से जुड़ी कहानी भी है. इसकी जड़ें इतिहास और पौराणिक कथाओं में गहराई तक जाती हैं.

कब है होली 2026?

ज्योतिर्विद और वास्तु विशेषज्ञ राकेश चतुर्वेदी के अनुसार, वर्ष 2026 में रंगों की होली 4 मार्च, बुधवार को मनाई जाएगी. वहीं, होलिका दहन 3 मार्च, मंगलवार को किया जाएगा.

कब होगा होलिका दहन?

फाल्गुन पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च 2026 को शाम 5 बजकर 55 मिनट से होगी और यह 3 मार्च को शाम 4 बजकर 40 मिनट तक रहेगी. इसी दौरान भद्रा भी लग रही है. 2 मार्च की शाम 5:55 बजे से भद्रा शुरू होकर 3 मार्च की सुबह 5:32 बजे तक रहेगी. भद्रा काल में शुभ कार्य नहीं किए जाते, इसलिए होलिका दहन भद्रा समाप्त होने के बाद ही किया जाएगा.

कब शुरु हुई थी होली का त्योहार

पौराणिक कथाओं में होली भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी बताई जाती है. पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि होली पर रंग खेलने की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण और राधे रानी द्वारा की गई थी. भगवान श्रीकृष्ण ने दोस्तों के साथ मिलकर सबसे पहले ब्रज में राधे रानी और उनकी सहेलियों के साथ होली खेली थी और उनको रंग लगाया था. होली का त्योहार भगवान श्री कृष्ण और राधे रानी के प्रेम का प्रतीक माना जाता है.

दरअसल, भगवान सांवले थे और राधे रानी गोरी थीं. भगवान श्रीकृष्ण ये सोचते थे कि राधा उन्हें पसंद नहीं करेंगी, क्योंकि वो काले हैं. इस पर माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि अगर तुम जाकर राधा को रंग लगा दोगे तो उसका रंग तुम्हारी तरह ही हो जाएगा. माता यशोदा की सलाह पर भगवान श्रीकृष्ण अपने दोस्तों के साथ राधा रानी और उनकी सहेलियों को रंग लगाने पहुंच गए.

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर राधा रानी और उनकी सहेलियों को खूब रंग लगाया. ब्रजवासियों को श्रीकृष्ण की राधा रानी और उनकी सहेलियों के साथ की गई ये शरारत खूब भाई. इस प्रेम भरे प्रसंग ने ब्रज में रंगों की होली की परंपरा को जन्म दिया, जो धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गई. आज भी मथुरा और वृंदावन में यह परंपरा खास उत्साह से निभाई जाती है.

पुराने समय में ऐसे मनाई जाती थी होली

पुराने समय में रासायनिक रंग नहीं होते थे. होली पूरी तरह प्राकृतिक तरीकों से मनाई जाती थी. लोग पलाश यानी टेसू के फूलों को पानी में भिगोकर केसरिया रंग तैयार करते थे. यह रंग त्वचा के लिए सुरक्षित माना जाता था. पीला रंग बनाने के लिए हल्दी का इस्तेमाल होता था और चंदन का लेप लगाकर तिलक किया जाता था.

फूलों की होली भी आम थी. गुलाब, गेंदे और टेसू की पंखुड़ियों से लोग एक-दूसरे पर रंग बरसाते थे. इसे प्रकृति के करीब माना जाता था. उस दौर में होली का मकसद सिर्फ रंग लगाना नहीं, बल्कि मेलजोल बढ़ाना और रिश्तों को मजबूत करना था.

इसे भी पढ़ें:-रामनवमी कब है? जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *