New Delhi: भारतीय सेना के प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी मंगलवार को अपने पद से रिटायर हो गए हैं। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को सेना प्रमुख के पद का कार्यभार सौंप दिया है। पद से रिटायर होने के पहले जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सेना की तैयारियों, क्षमता, सीमाओं और LoC पर स्थिति और ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल समेत कई अन्य जरूरी मुद्दों पर अपनी बात रखी।
कहा उत्तरी सीमाओं पर स्थिति स्थिर है। हाल के समझौतों से जमीन पर स्थिरता बढ़ी है। दोनों पक्ष एक-दूसरे की चिंताओं को लेकर अधिक संवेदनशीलता दिखा रहे हैं। सैन्य स्तर की बातचीत, हॉटलाइन, फ्लैग मीटिंग और कमांडर स्तर की बैठकें अच्छी तरह काम कर रही हैं। नियमित रूप से जमीनी स्तर पर बातचीत भी हो रही है। इससे सीमा प्रबंधन में मदद मिलती है और गलतफहमियां रोकने में सहायता मिलती है। हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं। पहली, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना
उन्होंने आगे कहा किऑपरेशन सिंदूर भारत के संकल्प, क्षमता और संयम का स्पष्ट उदाहरण था। यह आतंकवाद के विरुद्ध एक संतुलित और सटीक सैन्य कार्रवाई थी। इसे स्पष्ट उद्देश्य और पूरी तैयारी के साथ अंजाम दिया गया। इस ऑपरेशन ने दिखाया कि आज के समय में सेना की सफलता केवल हथियारों पर निर्भर नहीं होती। सही जानकारी, संयुक्त योजना, सुरक्षित संचार, सटीक कार्रवाई और सूचना प्रबंधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसमें गति, तालमेल, स्पष्ट सोच और नियंत्रण की भी बड़ी भूमिका होती है। इस ऑपरेशन से भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण सबक मिले हैं।
भारतीय सेना युद्ध के बदलते स्वरूप को लेकर कर रही है तैयारी
युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। भारतीय सेना भी इसी के अनुसार खुद को तैयार कर रही है। आधुनिकीकरण अब केवल नए हथियार या उपकरण लेने तक सीमित नहीं है। इसमें सेना की संरचना, प्रशिक्षण, तकनीक, सोच, काम करने की व्यवस्था और मानव संसाधन सभी शामिल हैं। भविष्य में तेजी से निर्णय लेना बहुत जरूरी होगा। इसके लिए जानकारी, निगरानी, हथियार, संचार व्यवस्था और कमांडरों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। इसलिए सेना अधिक तेज, अधिक जुड़ी हुई और तकनीक-सक्षम व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अशनि ड्रोन प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरियां इसी बदलाव का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य सेना को अधिक तेज, सटीक और सक्षम बनाना है।
भारतीय सेना की सोच और तैयारी में ड्रोन की भूमिका महत्वपूर्ण
ड्रोन अब आधुनिक सैन्य अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। अब उनका उपयोग केवल निगरानी के लिए नहीं होता। उनका उपयोग जानकारी जुटाने, लक्ष्य पहचानने, सटीक प्रहार, रसद पहुंचाने, कार्रवाई के बाद नुकसान का आकलन करने और सैनिकों की सुरक्षा जैसे कई कार्यों में किया जा रहा है। अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग प्रकार के ड्रोन की जरूरत होती है। कुछ ड्रोन स्थानीय निगरानी के लिए उपयोगी होते हैं। कुछ लंबी दूरी तक देखने के लिए होते हैं। कुछ रसद सहायता के लिए होते हैं और कुछ विशेष या सटीक कार्यों के लिए। हमारा ध्यान केवल अधिक ड्रोन लेने पर नहीं है। हमारा उद्देश्य ड्रोन से जुड़ी पूरी व्यवस्था तैयार करना है। इसमें स्वदेशी निर्माण, प्रशिक्षित जनशक्ति, रखरखाव, नियमित प्रशिक्षण, ड्रोन के उपयोग की स्पष्ट पद्धति, ड्रोन-रोधी क्षमता और सैन्य योजना में इनका बेहतर उपयोग शामिल है। इसका उद्देश्य सैनिकों और सैन्य गठनों को भविष्य के युद्धक्षेत्र में जरूरी तकनीकी बढ़त देना है।
भविष्य की युद्ध तैयारी के लिए आत्मनिर्भरता महत्वपूर्ण
आत्मनिर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा और भविष्य की युद्ध तैयारी की मुख्य आवश्यकता बन चुकी है। किसी भी संकट के समय देश को अपनी प्रणालियों, अपने उद्योग और अपनी क्षमता पर भरोसा करने में सक्षम होना चाहिए। स्वदेशी प्रणालियां अब सेना की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं। इनका उपयोग निगरानी, संचार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सटीक प्रहार, सूचना प्रबंधन और सैन्य निर्णय लेने में बढ़ रहा है। स्वदेशी क्षमता अब केवल सहायक नहीं, बल्कि सेना की मुख्य जरूरत बनती जा रही है। आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है। इसलिए सेना को लंबी दूरी तक सटीक प्रहार, बेहतर गोला-बारूद, ड्रोन, ड्रोन-रोधी प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, मजबूत संचार व्यवस्था और युद्धक्षेत्र की बेहतर जानकारी जैसे क्षेत्रों में लगातार आगे बढ़ना होगा। हमारा प्रयास भारतीय चुनौतियों के लिए भारतीय समाधान तैयार करना है। हमारी सीमाएं, चुनौतियां और सैन्य जरूरतें अलग हैं। इसलिए डीआरडीओ, रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक इकाइयों, निजी उद्योग, एमएसएमई, स्टार्ट-अप और शिक्षा जगत के साथ मिलकर स्वदेशी प्रणालियों को तेजी से परखने, बेहतर सहयोग देने और उन्हें जल्द सेना में शामिल करने पर काम किया जा रहा है।