Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि पितरों का महापर्व ग्यारहवां दिवस- पितृपक्ष की इंदिरा एकादशी व्रत÷ इन्दिरा एकादशी व्रत यमलोक,पितृलोक और अधोगति में पड़े पितरों का उद्धार करने वाला है। इन्दिरा एकादशी व्रत जो भक्तजन श्रद्धापूर्वक करते हैं।वो अपने अधोगति में गये हुए पितरों का उद्धार कर देते हैं। इस व्रत की कथा भी इसी से सम्बन्धित है। स्वयं श्रीकृष्ण पाण्डवों को, उसमें भी बड़े भाई युधिष्ठिर को यह कथा सुना रहे हैं।
महाराज युधिष्ठिर ने पूँछा मुझे आश्विनमास के कृष्णपक्ष,पितृपक्ष की एकादशी का माहात्म्य आपसे सुनना है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि- सतयुग में महिष्मती पुरी के राजा हुए इन्द्रसेन जी महाराज। वे बड़े हरिभक्त थे, वैष्णव थे, खूब भजन, पूजन, पाठ,दान, सेवा सब कुछ करते थे। लेकिन एकादशी व्रत नहीं करते थे। राजा इन्द्रसेन एक बार अपनी सभा में बैठे हुए थे तो उनकी सभा में नारद जी आये।
सतयुग में नारद जी भ्रमण किया करते थे। नारद जी को देखकर राजा इन्द्रसेन ने प्रणाम किया,आसन दिया। पूजन किया,चरण धोया,सुन्दर रूप में स्वागत किया और हाथ जोड़कर पूँछा आज आपका कैसे आगमन हुआ? आज आपने कैसे कृपा की?
तब नारद जी ने कहा मैं तुम्हारे पास सीधा यमपुरी से आ रहा हूँ।मैं यमपुरी गया था। राजा ने कहा आप यमलोक गये थे! आप तो भगवान के धामों में भ्रमण करते हो। श्री नारद जी ने कहा- यमराज महान वैष्णव है, उनसे मिलने के लिये गया था।वहां यमपुरी में मैंने तुम्हारे पिता को देखा। यह सुनते राजा इन्द्रसेन चौंक गये, मेरे पिता यमपुरी में,नारद जी ने कहा तुम्हारे पिताजी यमपुरी में कष्ट पा रहे हैं। राजा ने पूँछा क्यों कष्ट पा रहे हैं?
नारद जी ने बताया कि मैंने तुम्हारे पिता से ही पूछा- आप यमपुरी में क्यों कष्ट पा रहे हो? उन्होंने कहा मेरे द्वारा जीवन में एकादशी व्रत भंग हुआ था। इस कारण मुझे यमपुरी में आना पड़ा। अगर आप पृथ्वी लोक जाओ तो मेरे पुत्र से कहना,वे मेरे उद्धार के लिए कुछ करें। राजा इन्द्रसेन सुनकर व्याकुल हो गये। बताइए मेरे पिता ने क्या कहा? नारद जी ने कहा मैंने तुम्हारे पिता से ही पूँछा,आप ही अपने उद्धार का उपाय बता दो। तो आपके पिता ने बताया कि- मेरे पुत्र, मेरे परिवारी जनों को जाकर कहना कि- वो आश्विनमास कृष्णपक्ष जो पितृपक्ष की इन्दिरा एकादशी है। सब लोग इस एकादशी का व्रत करें, केवल इस एकादशी व्रत से मैं जो उनका पितृ हूं, मैं जो उनका पिता हूं, जो मेरी अधोगति हो गयी है। उस व्रत के प्रभाव से मेरा मोक्ष हो जायेगा। मुझे बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होगी।
राजा इन्द्रसेन ने आश्विनमास कृष्णपक्ष,पितृपक्ष की एकादशी पूरे परिवार मिलकर के किये और उसके पुण्य को पितृ बने हुए अपने पूज्य पिता को समर्पित किया। उनके पिताजी विमान पर आरूढ़ होकर भगवत धाम की प्राप्ति किये।भगवद् धाम जाते समय पूज्य पिताजी ने राजा
इन्द्रसेन को दर्शन देते हुए कहा कि- तुम सबकी एकादशी व्रत के प्रभाव से मैं भगवत धाम जा रहा हूं ,तुम सब प्रसन्न रहो।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).