Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि भगवान श्री गणेश जी को प्रसन्न करने का साधन बड़ा ही सरल और सुगम है। उसे प्रत्येक गरीब, अमीर व्यक्ति कर सकता है। उसमें न विशेष खर्च की, न विशेष दान-पुण्य की, न विशेष योग्यता की और न विशेष समय की आवश्यकता है। पीली मिट्टी की डली ले लो, उस पर लाल रंग की मौली लपेट दो, भगवान श्रीगणेशजी साकार रूप में उपस्थित हो गये। रोली का छींटा लगा दो और चावल के दाने डाल दो। पूजन की यही सरल विधि है। गुड़ की डली या चार बताशा चढ़ा दो, यह भोग लग गया।
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थजम्बू फल चारु
भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाश कारकं, नमामि विध्नेश्वर पाद पंकजम्।।
यह छोटा सा श्लोक बोल दो मंत्र हो गया। बस इतने मात्र से प्रभु आपसे प्रसन्न हो गये। कैसे दयालु हैं, कुछ भी न बने तो दूब ही चढ़ा दो और अपने सारे कार्य सिद्ध कर लो। खर्च कुछ भी नहीं और काम ज्यादा। यही तो प्रभु की विलक्षण महिमा है।
आज अधः पतन का एकमात्र कारण भगवान श्री विघ्न विनाशक गणेश जी का स्मरण नहीं करना है। पहले धर्म प्राण भारत के प्रत्येक विद्यालय में बालकों से सर्वप्रथम तख्ती पर ‘ श्री गणेशाय नमः ‘ लिखवाकर और भगवान श्री गणेश का पूजन करवाकर अध्यापक पढ़ाना प्रारम्भ करते थे। प्रतिवर्ष सारे विद्यालयों में भाद्रपद श्री गणेश चतुर्थी (डंडा चौथ) को श्री गणेश जी का बड़े धूमधाम के साथ पूजन कराया जाता था, जो बस देखते ही बनता था। समस्त भारत श्री गणेश जी की भक्ति के रंग में रंग जाता था। आज धर्मप्राण भारत के समस्त विद्यालयों में भगवान श्री गणेश जी का पूजन करना तो दूर रहा, उनका नाम भी नहीं लिया जाता।
जब तक विद्यार्थी भगवान श्री गणेश और माता सरस्वती का पूजन करते रहे, तब तक बालकों की बुद्धि शुद्ध और निर्मल रही। पर जब से विद्यार्थियों से भगवान् श्री गणेश जी का पूजन करना छुड़ाया गया,पूजनादि को पाखण्डबाद बताया गया। तब इन पढ़ने वाले विद्यार्थियों की बुद्धि विमल नहीं रही। जिसका घोर भयंकर दुष्परिणाम अनैतिकता, अनुशासनहीनता आदि के रूप में प्रत्यक्ष देखने में आ रहा है। जो पतन यवन शासनकाल में अथवा अंग्रेज शासन काल में नहीं हुआ, वह हो गया। बालकों को अक्षर ज्ञान कराते समय आजकल ग माने गणेश न पढ़कर गदहा पढ़ाया जाता है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना,।