अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर हमारे जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं गुरु

Religion: गुरु पुर्णिमा पर इन संस्कृत श्लोकों के जरिए अपले गुरुओं की वंदनाकरें, गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।  गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही शिव हैं, गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, ऐसे गुरु को मैं नमस्कार करता हूं। इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि सनातन धर्म में गुरुओं का स्थान ईश्वर से भी ऊंचा माना जाता है, क्योंकि गुरु ही हमारे जीवन से अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। इसी कारण उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय और साक्षात परमब्रह्म माना गया है। गुरु पूर्णिमा का दिन  हमें अपने जीवन में गुरु के महत्व को समझते  हुए उनका आभार प्रकट करने का अवसर प्रदान करता है। बता दे कि इसी दिन महाभारत महाकाव्य की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन शिष्य अपने गुरु के चरण छूकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस शुभ अवसर पर हम आपके साथ कुछ श्लोक साझा कर रहे हैं, जिनके माध्यम से आप अपने गुरुओं का वंदन करने के साथ-साथ गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं भी दे सकते हैं।

गुरु पूर्णिमा श्लोक      

विद्यां ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।

पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥

इसका यह अर्थ है कि गुरु से हमें ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान से विनम्रता आती है, विनम्रता से व्यक्ति योग्य बनता है, योग्यता से धन मिलता है और धन से धर्म की प्राप्ति होती है, जिससे अंततः सुख की प्राप्ति होती है। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, और गुरु ही शिव हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, ऐसे गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ।

निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते ।
गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते ॥

अर्थात जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते से चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं ।

दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन।

जैसे दूध बगैर गाय, फूल बगैर लता, शील बगैर भार्या, कमल बगैर जल, शम बगैर विद्या, और लोग बगैर नगर शोभा नहीं देते, वैसे ही गुरु बिना शिष्य शोभा नहीं देता ।

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो बताय॥

जब गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों, तब पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही हमें भगवान के बारे में बताया है और उनके दर्शन कराए हैं।

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