Coal formation: दुनियाभर में जब भी ऊर्जा संकट या कच्चे तेल की किल्लत की बात होती है तो पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर से अपने सबसे भरोसेमंद ईंधन साथी कोयले की तरफ जाता है. हाल ही में मिडिल ईस्ट में चल रहे बवाल के बीच दुनियाभर में तेल और गैस का संकट हो रहा है. इससे वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई, तब इस काले खजाने की अहमियत और ज्यादा बढ़ जाती है. भारत जैसे विकासशील देश के लिए तो कोयला आज भी उसकी तरक्की का सबसे बड़ा इंजन बना हुआ है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जमीन की गहराइयों में मिलने वाला यह काला खजाना आखिर कैसे बनता है और इसकी गुणवत्ता को कैसे मापा जाता है. आइए जानें.
बता दें कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की तरह ही कोयला भी लाखों-करोड़ों साल की प्रक्रिया के दौरान बना है. कोयले में उन पौधों द्वारा संग्रहित की गई ऊर्जा होती है, जो करोड़ों वर्ष पहले दलदली जंगलों में जीवित थे. लाखों-करोड़ों साल में मिट्टी और चट्टान की परतों ने इन पौधों को ढक दिया. इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए दबाव और गर्मी ने पौधों को उस पदार्थ में बदल दिया जिसे हम कोयला कहते हैं.
उसे कोयले में मौजूद कार्बन की मात्रा और उसकी हीटिंग वेल्यू के आधार पर किया जाता है. एंथ्रेसाइट कोयले में 86-97% कार्बन होता है. यह टॉप स्टैंडर्ड कोयला है, जिसकी हीटिंग वेल्यू सबसे ज्यादा होती है. एंथ्रेसाइट का उपयोग मुख्य रूप से धातु उद्योग में किया जाता है.
बिटुमिनस कोयला में 45-86% कार्बन होता है. इसका उपयोग बिजली पैदा करने के लिए किया जाता है और यह लोहा एवं इस्पात उद्योग के लिए कोकिंग कोल बनाने का एक महत्वपूर्ण ईंधन और कच्चा माल है. वहीं सब-बिटुमिनस कोयले में आमतौर पर 35-45% कार्बन होता है. इसकी हीटिंग वेल्यू बिटुमिनस की तुलना में कम है.
इसके अलावा लिग्नाइट में 25-35% कार्बन होता है और सभी कोयला श्रेणियों में इसकी हीटिंग वेल्यू सबसे कम है. लिग्नाइट कोयले के भंडार तुलनात्मक रूप से नए (कम पुराने) होते हैं और इन पर अत्यधिक गर्मी या दबाव नहीं पड़ता. लिग्नाइट भुरभुरा होता है और इसमें नमी की मात्रा अधिक होती है, जो इसके कम हीटिंग मान का कारण बनती है.
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