कर्म, भक्ति और ज्ञान होता है चरित्रार्थ: दिव्य मोरारी बापू

Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि वंदन अर्थात् सत्य सेवा निष्ठ विश्वास घात न करने की प्रतिज्ञा। हम आपके सत्य निष्ठ सेवक हैं, कभी विश्वासघात नहीं करेंगे। वंदन में केवल सिर झुकाने की स्थूल क्रिया नहीं है, बल्कि उसमें तीन महत्वपूर्ण प्रयोजन हैं। हृदय, हाथ और मस्तिष्क। मस्तक झुकाते हैं, हाथ जोड़ते हैं। इनमें हृदय के भाव प्रकट होते हैं। हाथ का मतलब है कर्म, हृदय अर्थात् भक्ति और मस्तिष्क अर्थात् बुद्धि।

कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों चाहिए तब जाकर वंदन चरित्रार्थ होता है। यह केवल स्थूल क्रिया ही नहीं बल्कि हृदय का भाव इतना बढ़ जाता है कि वह विश्वम्भर को भी वशीभूत कर देता है। गोस्वामी तुलसीदास महाराज श्री राम के चरणों में समर्पित हुए तो विनय पत्रिका में कहते हैं- जाऊं कहां तजि चरण तुम्हारे। काको नाम पतित पावन जग केहिं अति दीन पियारे।।

वंदन में मस्तिष्क का बड़ा ही महत्व है। बिना समझे इसे झुकाना नहीं चाहिए और यदि एक बार किसी के चरणों में झुक गया तो उठाना मत। स्वामी रामतीर्थ उत्तराखंड में भ्रमण करते थे,आपने पूरा भारत भ्रमण किया और विदेश की भूमि पर भी स्वामी जी का खूब प्रवास रहा। स्वामी जी को जब कोई प्रणाम करने आता तो स्वामी जी कहते ठहरो! पहले आसपास के लोगों से मेरे विषय में जान लो, कहीं ऐसा न हो कि प्रणाम करने के बाद तुम्हें हमारी निंदा भी करना पड़े। एक बार प्रणाम करके फिर निंदा करना यह तो भस्मासुर का काम है, यह अच्छा नहीं है। आजकल लोग प्रणाम भी करते हैं फिर निंदा भी करते हैं। जिसको प्रणाम किया उसके लिए निंदा का स्थान ही नहीं बचता।

सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) श्री दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).

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