Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला गुरुपूर्णिमा पर्व का इतिहास प्राचीनकाल से जुड़ा है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। सनातन धर्म में वेदों के संकलनकर्ता और 18 पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास को जगत का प्रथम गुरु माना जाता है। उनके जन्म दिवस को गुरुओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए ऋषि-महर्षियों के द्वारा चुना गया।
योग परम्परा के अनुसार इसी पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने हिमालय में अपने ज्ञान का प्रसार शुरू किया था और सप्तऋषियों को अपना शिष्य बनाया था। योग के बड़े-बड़े आचार्यों के द्वारा इस दिन को गुरुओं के सम्मान के लिए निश्चित किया गया। इस दिन शिष्य अपने आध्यात्मिक और शैक्षणिक गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनसे आशीर्वाद लेते हैं।
गुरु वह है जो शिष्य के मोह रूपी अन्धकार को दूर करे। जैसे सूर्य नारायण सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करते हैं उसी प्रकार गुरु शिष्य को उत्तम बुद्धि देकर उसके अन्तर्जगत को प्रकाशित करते हैं। शास्त्रों में गुरु को साक्षात् परमब्रह्म कहा गया है। भगवान ने श्री मुख से कहा है कि- आचार्य को मेरा स्वरूप जानना चाहिए। उनका कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए और न मनुष्य मानकर उनकी निन्दा करना चाहिए। क्योंकि गुरु सर्वदेवमय है।
जो प्रभु के पास ले जाता है, वह प्रभु से भी श्रेष्ठ है। सद्गुरु की कृपा से ही बुद्धि में स्थिरता आती है। सद्गुरु की शरण प्रभु के चरणों में पहुंचती है। जो स्वयं मोह में फंसा हो, वह दूसरे को मोह से कैसे छुड़ा सकता है? जो वाणी के बजाय व्यवहार से समझाए, वही सद्गुरु है। सन्त ही सर्वेश्वर के स्वरूप की पहचान करते हैं।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).