Religion: हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनहार के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगता है, तब भगवान विष्णु अलग-अलग रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं। उनके इन्हीं अद्भुत अवतारों में से एक है वराह अवतार। वराह का अर्थ जंगली सूअर होता है। भगवान विष्णु ने इसी रूप में अवतार लेकर समुद्र में डूबी पृथ्वी को बाहर निकाला और असुर हिरण्याक्ष का वध किया था। भगवान विष्णु के इस दिव्य स्वरूप में शक्ति, साहस और संरक्षण का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। जानिए कब है वराह जयंती।
कब है वराह जयंती
वराह जयंती हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाई जाती है। इस साल यह पर्व रविवार, 13 सितंबर को मनाया जाएगा। तृतीया तिथि की शुरुआत 13 सितंबर की सुबह 7 बजकर 8 मिनट से होगी और इसका समापन 14 सितंबर को सुबह 7 बजकर 8 मिनट पर होगा।
पूजा का शुभ मुहूर्त
भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की पूजा के लिए मध्याह्न का समय विशेष शुभ माना गया है। पंचांग के मुताबिक 13 सितंबर को पूजा का शुभ समय दोपहर 1:30 बजे से शाम 4 बजे तक रहेगा। इस अवधि में श्रद्धालु भगवान वराह की विधि-विधान से पूजा कर सकते हैं।
वराह जयंती पूजा विधि
वराह जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और आचमन के बाद व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा की तैयारी करें। पूजा स्थल पर जल से भरा कलश रखें और उसके ऊपर भगवान वराह की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद पंचामृत से भगवान विष्णु के वराह स्वरूप का अभिषेक करें। अभिषेक के बाद भगवान को पीले वस्त्र, पीले फूल, मिष्टान्न और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के दौरान भगवान विष्णु के वराह स्वरूप का ध्यान करते हुए ‘ॐ वाराहाय नमः’ मंत्र का जाप करें। दीपक और धूप जलाकर श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु की आरती करें। अंत में भगवान विष्णु से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।