1000 साल पुराने बृहदेश्वर मंदिर का क्या खास है इतिहास,  वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए इसका रहस्य

Brihadeeswara Temple History: भारत में कई ऐसी ऐतिहासिक इमारतें हैं, जिन्हें देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं. इन्हीं में से एक है तमिलनाडु के तंजावुर में बना बृहदेश्वर मंदिर, जो करीब 1,000 साल बीत जाने के बावजूद बिना नींव का आज भी बिना किसी नुकसान के खड़ा हुआ है. इस मंदिर को साल 1987 में यूनेस्को ने अपनी विश्व धरोहरों में शामिल किया था. इस मंदिर में संस्कृत और तमिल भाषा में लिखे अक्षरों की नक्काशी वाले बेहद सुंदर शिलालेख हैं, जिनमें गहनों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है.

बिना सीमेंट कैसे बनाया गया?

मंदिर को बनाने में बड़े-बड़े ग्रेनाइट पत्थरों का इस्तेमाल किया गया, जिन्हें बिना सीमेंट के एक-दूसरे के साथ इस तरह जोड़ा गया कि पूरी रचना बेहद मजबूत बन गई. माना जाता है कि पत्थरों को इस तरह काटा और फिट किया गया था कि वह अपने वजन और संतुलन की वजह से मजबूती से टिके रहें.

राजराजेश्वर मंदिर की रुपरेखा और निर्माणकर्ता

राजराजेश्वर मंदिर का नाम बृहदेश्वर महादेव मराठा सेना ने तंजौर पर कब्जा करने के बाद किया था. 66 मीटर ऊंचा यह मंदिर करीब 240.90 मीटर लंबा और 122 मीटर चौड़ा है. इस मंदिर का कैंपस करीब 6 वर्ग किलोमीटर का है, जिसमें ताजमहल जैसी 200 बिल्डिंग बनाई जा सकती हैं. इस मंदिर का निर्माण चोल वंश के राजा राजराज प्रथम ने साल 1010 ईस्वी के आसपास करवाया था. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर अपनी भव्य कला और इंजीनियरिंग के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है.

राजराजेश्वर मंदिर का रहस्य

इस मंदिर के मुख्य गुंबद  की परछाईं दोपहर के समय जमीन पर नहीं पड़ती.  यह आज भी वैज्ञानिकों और भक्तों को हैरान करता है. जो आज भी रहस्य बना हुआ है. मंदिर के शीर्ष पर लगभग 80 टन (80,000 किलो) का एक विशाल पत्थर लगा है. बिना किसी क्रेन या आधुनिक तकनीक के उस काल में इतने भारी पत्थर को 216 फीट की ऊंचाई तक कैसे पहुंचाया गया, यह आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली है.

पूरा मंदिर लगभग 1,30,000 टन ग्रेनाइट पत्थरों से बना है. हैरान करने वाली बात यह है कि 50-60 किलोमीटर के दायरे में कहीं भी ग्रेनाइट की खदानें मौजूद नहीं हैं.  यह दुनिया के सबसे ऊंचे मंदिरों में से एक है जो बिना किसी नींव (foundation) के केवल पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाया गया है. मंदिर के पत्थरों को जोड़ने के लिए सीमेंट, चूने या किसी गोंद का इस्तेमाल नहीं किया गया है. इन्हें ‘पजल तकनीक’ (इंटरलॉकिंग) के जरिए आपस में फिट किया गया है.

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