Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि सन्तति न होने पर शरीर का त्याग करने के लिए गए हुए आत्मदेव को समझाते हुए देवर्षि श्रीनारदजी ने कहा था- ” भाई , पुत्र-पुत्री का मोह नहीं रखना चाहिए। वे यदि योग्य न निकले तो वेदना का कोई पार नहीं रहता। आत्मा का अगर कोई हितैषी पुत्र है तो वह एकमात्र विवेक है। विवेक रूपी पुत्र से ही जीव को सद्गति प्राप्त होती है और विवेक रूपी पुत्र की प्राप्ति सत्संग से ही होती है। फिर आत्मदेव आपके पुत्र नहीं है, इसमें बुरा क्या है? प्रभु जिस परिस्थिति में रखे उसमें सन्तोष मानोगे तो आपके जैसा सुखी दूसरा कोई नहीं होगा।”
किन्तु सन्त का उपदेश आत्मदेव को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने तो कहा कि पुत्र हो तो पिण्डदान करेगा और तभी मेरा उद्धार होगा। तब सन्त ने स्नेह से समझाया कि पुत्र के पिण्डदान से उद्धार होने वाली बात पूर्णरूपेण यथार्थ नहीं है। पुत्र यदि अच्छा न निकला तो वह शायद पिण्डदान ही न करे और करे भी तो उसका पिण्डदान अपवित्र हो सकता है। इसलिए आप अपनी देह को ही प्रभु एवं परोपकार के कार्यों में संलग्न करके अपना पिण्डदान स्वयं करो उसी में आपकी सद्गति होगी।
किन्तु यह शिक्षा आत्मदेव को अच्छी नहीं लगी, फलस्वरूप वे अपने दुराग्रह के कारण बहुत दुःखी हुए। कथा सुनने के बाद जीवन में नया चैतन्य न आए और नया जीवन प्रारम्भ न हो तो कथा सुनना सम्पूर्ण रूप से सार्थक नहीं माना जायेगा। जो प्रभु एवं परोपकार के लिए पीड़ा सहता है, उसे रोना नहीं पड़ता। प्रवृत्ति का विषयानन्द छोड़ोगे तभी निवृत्ति का नित्यानन्द प्राप्त कर सकोगे। प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा मिला दो, तो आपकी भक्ति बरसाती नदी के समान बढ़ेगी। जिस तरह धन प्राप्त करने के लिए पसीना बहाते हो, इसी तरह परमात्मा को प्राप्त करने के लिए भी पसीना बहाओ।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) श्री दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).