विवेक रुपी पुत्र से मिलती है सद्गति: दिव्य मोरारी बापू

Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि ममता राखे राम से, समता सब संसार। संसार में सम्मान सबका करना चाहिए, महत्व सबको देना चाहिए लेकिन ममता किसी से नहीं रखना चाहिए। तीन शब्द अपने शास्त्रों में बताया गया। प्रेम, आसक्ति और ममता। प्रेम का प्रारम्भ भले ही दुखद हो लेकिन परिणाम सुखद होता है। आसक्ति का प्रारम्भ भले ही सुखद हो लेकिन परिणाम दुखद होता है। लेकिन ममता व्यक्ति को हमेशा रुलाती है।

संसार के लिए रोना ठीक नहीं है। इसलिए धर्मशास्त्र कहते हैं की ममता परमात्मा के चरणों में रखना चाहिए और संसार में समता सबके प्रति सद्भाव सम्मान रखना चाहिए। संतन मिलि निर्णय कियो मथि श्रुति पुराण इतिहास। भजिवे को दो ही सुघर कै हरि कै हरिदास।।भक्तमाल।।

स्मरण, सुमिरण, चिन्तन, मनन करने योग्य इस संसार में दो ही है। तीसरा कोई नहीं है। या तो परमात्मा या परमात्मा की लाडले, प्यारे, दुलारे भक्तजन, संतजन। पुत्र-पुत्री पर मोह नहीं रखना चाहिए। उनको पढ़ाना, योग्य बनाना, सारी जिम्मेदारी का सुन्दर ढंग से पालन करना चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि पुत्र-पुत्री हमारे उद्धार का कारण नहीं बनेंगे। अगर पुत्र-पुत्री से ही उद्धार होता तब तो सभी का उद्धार हो जाना चाहिए था। क्योंकि पुत्र-पुत्री तो सबके होते हैं। विवेक रूपी पुत्र ही सद्गति दिलाता है।

हमें अपना उद्धार स्वयं ही करना है। सद्गति पुत्र से नहीं सत्कर्म से प्राप्त होती है। शरीर को परोपकारी एवं परमात्मा के काम में हवन कर देना अर्थात् लगा देना, न्यौछावर कर देना ही, सच्चा पिण्डदान है। आप अपना श्राद्ध खुद ही करो। श्रद्धा पूर्वक किया गया सत्कर्म ही श्राद्ध है। सत्कर्म से ही सद्गति प्राप्त होती है।

सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).

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