माता-पिता पुत्री के प्रति रखते हैं निस्वार्थ प्रेम: दिव्य मोरारी बापू

Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि भगवान शिव पार्वती विवाह के उपरान्त भगवती पार्वती की विदाई, पातिव्रत धर्म का उपदेश, गृहस्थ आश्रम की महिमा, कार्तिकेय भगवान का प्राकट्य, तारकासुर का उद्धार और भगवान गणेश के प्राकट्य की कथा का गान किया गया। भगवान् शिव की बारात हिमाचल महाराज के हैं पाँच दिन तक रुकी। विदाई के समय भगवती पार्वती सामान्य बहनों की भांति अपनी माता श्री मैना जी से लिपटकर रोने लगी। माता-पिता का पुत्री के प्रति निस्वार्थ प्रेम होता है। अपनी पुत्री को खूब योग्य बनाकर, बहुत खर्च कर, माता-पिता उसका विवाह करते हैं। लेकिन उनको अपनी पुत्री से कोई स्वार्थ नहीं है। बदले में कुछ लेना नहीं है। पिता पुत्र के प्रेम में स्वार्थ होता है, पुत्र को पिता से सब कुछ मिलना है और पिता को भी पुत्र से बहुत सेवा प्राप्ति  की कामना है।

पिता-पुत्री का प्रेम निस्वार्थ है। पिता को अपनी पुत्री से कुछ भी नहीं लेना है, पुत्री भी ऐसा त्याग सम्पन्न पात्र है। विवाह के पूर्व पिता की सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति कहने वाली पुत्री विवाह होने पर सब कुछ छोड़ करके पति के यहां चली जाती है। और वह फिर उसमें कोई अपना अधिकार नहीं मानती। जहां प्रेम निस्वार्थ होता है वहां वियोग बहुत करूण होता है। व्यक्ति के जीवन में बड़ी-बड़ी कठिनाइयां आती है, पुरुष जल्दी रोता नहीं है लेकिन एक ऐसा प्रसंग है जब हर व्यक्ति की आंख में आंसू होते हैं और वह प्रसंग है उसकी पुत्री की विदाई। श्रीशिवमहापुराण में भगवती पार्वती की विदाई पर उनके पिता हिमाचल महाराज बहुत रोये, पूरा परिवार बहुत  गम्भीर हुआ। कन्या की विदाई का प्रसंग बड़ा करूण होता है।

पातिव्रत धर्म में सब कुछ पति की प्रसन्नता के लिए करना होता है। जैसे भक्त सब कुछ भगवान की प्रसन्नता के लिए करते हैं, जैसे श्रेष्ठ पुत्र माता-पिता की प्रसन्नता के लिए करते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ पत्नी सब कुछ अपने पति की प्रसन्नता के लिए करती है। अगर उसका पति प्रसन्न हो जाए तो पत्नी को लगता है कि हमारा कार्य सफल हो गया।

धन्यो गृहस्थ आश्रमः। गृहस्थ आश्रम को धन्य बताया गया है। गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों की जननी कहा गया है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, सन्यासी सब गृहस्थ में ही जन्म लेते हैं और सबका लालन-पालन गृहस्थ  में ही हुआ है।

आध्यात्मिक दृष्टि से तारकासुर ही बहम है, यही हमारी अशान्ति के मूल में है। श्रद्धा विश्वास स्वरूप शिव पार्वती मिले तो जीवन कार्तिकेय भगवान का आना यह पुरुषार्थ का प्रतीक है । जिससे जीवन में शांति होती है उसके उपरान्त विवेक स्वरूप गणेश जी का प्राकट्य होता है। कल की कथा में गणेश जी के विवाह पर्यंत कथा का गान किया जायेगा । येठगा।

सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).

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