History of Temple Donations: जब भी हम किसी मंदिर में जाते हैं, तो हर किसी के मन को शांति मिलती है. सालों से मंदिरों में एक परंपरा चलती आ रही है, जो दुनिया के हर मंदिर में की जाती है, वह है मंदिर में दान करना. आज के समय में पैसों और धातु के अलावा, अब लोग जमीन-जायदाद भी दान कर देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं यह प्रथा, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है, इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई होगी. बता दें कि मंदिर में दान देने की यह आदत हजारों साल पुरानी है और इसके पीछे एक बेहद गहरी और दिल को छू लेने वाली कहानी है. आइए आपको बताते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.
मंदिरों में दान देने की परंपरा
मंदिरों में दान देने की परंपरा का सबसे पहला उल्लेख 268-232 ईस्वी में लिखे लुम्बिनी के रुम्मिनदेई स्तंभ लेख में मिलता है. इसमें जिक्र है कि सम्राट अशोक ने बौद्ध संघ को दान में जमीन दी थी. इसके अलावा लुम्बिनी गांव को करमुक्त किया था और धम्म यात्रा के दौरान वहां स्तंभ स्थापित कराया था. बेशक ये बौद्ध संस्था को दिए गए दान का प्रमाण है, लेकिन इसे धार्मिक संस्थाओं को दान देने की परंपरा की शुरुआत के तौर पर माना जाता है.
हिंदू मंदिरों को दान देने के अभिलेख
हालांकि बड़े पैमाने पर हिंदू मंदिरों को दान देने के अभिलेख गुप्त काल से मिलते हैं. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक यह मंदिर स्थापत्य और दान का स्वर्ण युग था. 550 से 750 ईस्वीं तक चालुक्य काल में महाबलीपुरम में अद्भुत मंदिर बने. इसके बाद चोल साम्राज्य यानी 900 से 1300 ईस्वीं तक भारत में मंदिर अपनी अर्थव्यवस्था खुद संभालने लगे थे. तंजापुर का बृहदेश्वर मंदिर इसी दौर में राजराज चोल प्रथम ने बनवाया था. असके अभिलेखों के मुताबिक हजारों एकड़ जमीन दान दी गई थी. संगीतकार, पुजारी, कारीगर सब मंदिर प्रबंधन के अंडर में काम करते थे.
मंदिर बने समाज की रीढ़
प्राचीन भारत में मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं थे, वे पूरे समाज की जरूरतें पूरी करते थे. जो दान मंदिरों को मिलता था, उससे गरीबों को खाना, गरीब बच्चों की पढ़ाई-लिखाई होती थी. यह बात महाभारत में भी लिखी गई है कि अपनी कमाई का एक तिहाई हिस्सा समाज के काम में लगाना चाहिए, इससे जरूरतमंदों को सहारा मिलता है. हमारे पूर्वजों ने यही सोचकर मंदिरों में दान देना शुरू किया था, ताकि इससे धन संकट के समय पूरे समाज के काम आएगा.
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