मान-अपमान में मन को शान्त रखना सबसे महान पुण्यकार्य: दिव्‍य मोरारी बापू

Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि स्वर्ग पुण्य कर्मों का फल, सुख प्राप्त करने की भूमि है और पृथ्वी कर्मभूमि है। पृथ्वी पर हम सब नया कर्म करते हैं, जिसका फल हमारे कर्मों के अनुसार अलग-अलग लोकों में प्राप्त होता है। स्वर्ग के लोगों का जीवन मुख्य रूप से सुख-प्रधान होता है, अतः वहां नया पुण्य पैदा नहीं किया जा सकता है, जबकि पृथ्वी पर सदाचार पूर्वक जीवन व्यतीत करके पुण्य कमाया जा सकता है।

स्वर्ग सुख भोगने के लिए अच्छा स्थान हो सकता है, किंतु वह हमारे पुण्य की जमा पूँजी समाप्त करने वाला है, अतः दुःखदायी है। जबकि पृथ्वी पर चाहे अपार वेदना सहनी पड़ती है, फिर भी यहाँ नया सत्कर्म करने की अनुकूलता होने के कारण स्वर्ग के देवता भी भारत भूमि में जन्म लेकर पुण्य कमाने की इच्छा रखते हैं।

इसका कारण यह है कि स्वर्ग के लोग भले ही सुख भोगते हों, पर शांति नहीं भोग सकते। क्योंकि वहां नई आवक का कोई साधन नहीं है, केवल संचित पुण्यों को खर्च कर डालने की ही बात है। थोड़ा धन यदि सुख प्राप्त होने में खर्च हो और बाकी धन प्रभु सेवा में काम आए तो लक्ष्मी जी प्रसन्न रहेंगी।

मान – अपमान में मन को शान्त रखना सबसे महान पुण्यकार्य है। परमात्मा सनमुख आये हुए जीव को, प्रेम से गले लगाते हैं। मनुष्य धन के पीछे पागल बनता है, इसीलिए वह भटकता रहता है। दुरुपयोग होने पर पैसा जहर है। सदुपयोग होने पर पैसा अमृत है।

सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) श्री दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).

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