मध्यस्थता की कार्यवाही का स्थान बदलने से नही बदलती न्यायिक अधिकारिता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

Prayagraj: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए कहा कि मध्यस्थता की कार्यवाही को किसी अन्य स्थान पर सुविधानुसार संचालित करने से उसकी निर्धारित सीट और उससे जुड़ी न्यायिक अधिकार नहीं बदले जाते।

न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की एकल पीठ ने बीबी कोटेक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि कानपुर नगर की वाणिज्यिक अदालत द्वारा पारित 17 फरवरी 2026 के आदेश को रद कर दिया।

वाणिज्यिक अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि मध्यस्थता की कार्यवाही प्रयागराज में चल रही थी। इसलिए क्षेत्राधिकार प्रयागराज की अदालत को प्राप्त है।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि खरीद आदेश की धारा 17.1 और 17.2 में स्पष्ट रूप से कानपुर नगर को मध्यस्थता का स्थान तथा कानपुर की अदालतों को विशेष अधिकारिता प्रदान की गई है। इसलिए समय-विस्तार संबंधी आवेदन कानपुर की वाणिज्यिक अदालत में दाखिल किया गया था।

हाई कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों की सुविधा के लिए मध्यस्थता की कार्यवाही प्रयागराज में संचालित की गई, लेकिन इससे अनुबंध में निर्धारित सीट और क्षेत्राधिकार प्रभावित नहीं होते।

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि मध्यस्थता की ‘सीट’ ही यह तय करती है कि किस न्यायालय को पर्यवेक्षी अधिकार प्राप्त होगा, जबकि ‘वेन्यू’ केवल कार्यवाही आयोजित करने का सुविधाजनक स्थान हो सकता है।

न्यायालय ने माना कि कानपुर नगर को जानबूझकर मध्यस्थता की सीट के रूप में निर्धारित किया गया था। ऐसे में केवल कानपुर की अदालतों को ही इस मध्यस्थता विवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई का अधिकार है।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने वाणिज्यिक अदालत, कानपुर नगर के आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनः उसी अदालत को भेज दिया। निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार दो माह के भीतर नया आदेश पारित करें।

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